राज्य संरक्षित बूढ़ेश्वर शिव मंदिर की सुरक्षा पर सवाल, बारिश से बचाने तिरपाल का सहारा

धमधा। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व रखने वाले बूढ़ेश्वर शिव मंदिर के वर्तमान स्थिति में इसके संरक्षण और देखरेख को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बरसात के मौसम में मंदिर के ऊपरी हिस्से से पानी टपकने की स्थिति सामने आने के बाद मंदिर को बारिश से बचने के लिए अस्थायी तौर पर तिरपाल से ढकने का सहारा लिया जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि सदियों पुरानी इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए स्थायी इंतजाम कब किए जाएंगे?

धमधा में चौखड़िया तालाब और बूढ़ा तालाब के तट पर स्थित बुद्धेश्वर शिव मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। मंदिर परिसर में लगे विभागीय सूचना बोर्ड के अनुसार, मंदिर का निर्माण लगभग 14वीं – 15वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ माना गया है। मंदिर की प्राचीन स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक महत्व इसे क्षेत्र की महत्वपूर्ण धरोहरों में शामिल करते हैं।
बारिश से बचाने तिरपाल का सहारा, संरक्षण व्यवस्था पर सवाल

मौजूदा बरसात में मंदिर के ऊपरी हिस्से से पानी टपकने की स्थिति को देखते हुए मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर तिरपाल और अस्थायी ढकाव का सहारा लिया जा रहा है। यह व्यवस्था तत्काल बारिश से बचाव के लिहाज से भले ही मददगार हो, लेकिन इतने पुराने और संरक्षित मंदिर के लिए इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि लगातार बारिश का पानी मंदिर के संरचनात्मक हिस्सों तक पहुंचता रहा तो भविष्य में इसका असर प्राचीन पत्थरों, दीवारों और स्थापत्य संरचना पर कितना पढ़ सकता है?
पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारी पर भी उठ रहे सवाल
जब किसी प्राचीन धरोहर को संरक्षण की श्रेणी में रखा जाता है, तो उसकी संरचना को मौसम और प्राकृतिक क्षरण से सुरक्षित रखना भी संरक्षण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। ऐसे में बूढ़ेश्वर शिव मंदिर की वर्तमान स्थिति विभागीय निगरानी और संरक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर ध्यान आकर्षित करती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर की ऊंचाई बहुत अधिक नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञों की तकनीकी सलाह और पुरातात्विक नियमों के अनुरूप मंदिर के ऊपर ऐसी सुरक्षात्मक टीन शेड अथवा अन्य स्थायी वर्षा – रोधी व्यवस्था तैयार की जा सकती है, जिससे मूल प्राचीन संरचना को नुकसान पहुंचाए बिना बारिश के पानी से बचाव किया जा सके।
हालांकि, इस तरह का कोई भी निर्माण पुरातत्व विभाग की अनुमति, विशेषज्ञों की तकनीकी राय और संरक्षण मानकों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए, ताकि सुरक्षा के नाम पर मंदिर की मूल स्थापत्य पहचान प्रभावित न हो।
जिम्मेदारों को जानकारी, फिर भी स्थायी समाधान का इंतजार

स्थानीय स्तर पर संबंधित जिम्मेदारों को मंदिर की स्थिति से अवगत कराए जाने की बात सामने आई है। बावजूद इसके, अभी तक ऐसा कोई ठोस और संतोषजनक समाधान सामने नहीं आया है, जिससे यह भरोसा हो सके कि बारिश के मौसम में मंदिर की प्राचीन संरचना पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।
यह मामला किसी सामान्य भवन की मरम्मत का नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण का है। इसलिए यहां तत्कालीन राहत से अधिक स्थायी और वैज्ञानिक संरक्षण व्यवस्था की आवश्यकता है।
अब सवाल विभाग और प्रशासन से…
बूढ़ेश्वर शिव मंदिर की प्राचीनता को देखते हुए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बारिश से बचाने के लिए तिरपाल लगाया गया या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या मंदिर की संरचना को लंबे समय के लिए सुरक्षित रखने की कोई ठोस संरक्षण योजना तैयार है?
क्या पुरातत्व विभाग ने मंदिर की छत और ऊपरी संरचना का तकनीकी निरीक्षण कराया है?
क्या पानी के रिसाव के कारणों का स्थायी समाधान किया जाएगा?
क्या विशेषज्ञों की निगरानी में वर्षा से बचाव की व्यवस्था बनाई जा सकती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अगली बारिश से पहले बूढ़ेश्वर शिव मंदिर को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे?
स्थानीय लोगों की मांग है कि पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए मंदिर का तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराएं और प्राचीन संरचना को नुकसान से बचाने के लिए संरक्षण विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार स्थायी उपाय करें।
इतिहास की ऐसी धरोहरें एक बार क्षतिग्रस्त होने के बाद उन्हें पुराने स्वरूप में वापस लाना आसान नहीं होता। इसलिए बूढ़ेश्वर शिव मंदिर के मामले में ‘क्षति होने के बाद संरक्षण’ के बजाय ‘क्षति से पहले संरक्षण’ की नीति पर काम करना समय की जरूरत है।



