लाल बंगले की सियासत अब खामोश: धमधा के प्रभावशाली राजनेता अरुण अग्रवाल के निधन से एक राजनीतिक दौर का अंत

विधायक का पद भले नहीं मिला, लेकिन दशकों तक धमधा की राजनीति में रहा गहरा प्रभाव; चुनावी रणनीति और राजनीतिक समीकरणों के लिए थे चर्चित
धमधा। दुर्ग जिले के धमधा की राजनीति में दशकों तक अपनी अलग पहचान बनाने वाले मालगुजार और चर्चित राजनेता अरुण अग्रवाल का 29 अगस्त 2026 को निधन हो गया। उनके निधन के साथ धमधा की राजनीति के उस दौर का अंत माना जा रहा है, जिसमें बिना किसी बड़े निर्वाचित पद पर रहते हुए भी उनका राजनीतिक प्रभाव बेहद व्यापक रहा।
अरुण अग्रवाल भले ही स्वयं कभी विधायक नहीं बन सके, लेकिन धमधा की चुनावी राजनीति में उनकी भूमिका लंबे समय तक किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि से कम नहीं मानी गई। चुनावी दांव-पेंच, राजनीतिक समीकरण और रणनीति बनाने में उन्हें माहिर माना जाता था। क्षेत्र में यह चर्चा आम थी कि वे जिस प्रत्याशी के पक्ष में खड़े हो जाते, उसके लिए चुनावी बिसात पूरी ताकत से बिछा देते थे।
राजनीतिक विरासत से मिली थी सियासत की समझ
अरुण अग्रवाल को राजनीति की प्रेरणा अपने बड़े पिताजी और धमधा के प्रथम मालगुजार दाऊ बागेश्वर प्रसाद अग्रवाल से मिली। दाऊ बागेश्वर प्रसाद लगभग 30 वर्षों तक निर्विरोध सरपंच रहे। परिवार की राजनीतिक और सामाजिक विरासत ने अरुण अग्रवाल को क्षेत्र की राजनीति को करीब से समझने का अवसर दिया।
धमधा का ‘लाल बंगला’ लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा। यहां चुनावी रणनीतियां बनती थीं, राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा होती थी और उम्मीदवारों को लेकर फैसले लिए जाते थे। नेताओं से लेकर अधिकारियों तक उनकी बात का अपना प्रभाव था।
तीन बार विधानसभा चुनाव में आजमाई किस्मत

अरुण अग्रवाल ने स्वयं भी विधानसभा की राजनीति में अपनी किस्मत आजमाई। वर्ष 1980 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हुए उन्हें 13,622 वोट यानी 28.16 प्रतिशत मत मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस (आई) के प्यारे लाल बेलचंदन 19,215 वोट हासिल कर विजयी हुए।
इसके बाद 1990 में जनता दल के टिकट पर उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें 22,647 वोट यानी 32.71 प्रतिशत मिले। कांग्रेस के जागेश्वर साहू 24,900 वोट पाकर विजयी हुए और अरुण अग्रवाल महज 2,253 वोटों से पीछे रह गए।
वर्ष 2003 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के टिकट पर उन्होंने तीसरी बार विधानसभा चुनाव लड़ा। इस बार उन्हें 13,350 वोट यानी 11.61 प्रतिशत मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू ने 48,661 वोट हासिल कर चुनाव जीता।
लगातार तीन विधानसभा चुनाव लड़ने के बावजूद अरुण अग्रवाल विधायक नहीं बन सके, लेकिन इससे उनकी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
पद से ज्यादा प्रभाव की राजनीति
वर्ष 1995 से 2005 के बीच जनपद पंचायत से लेकर नगर पंचायत तक क्षेत्र की राजनीति में उनके समर्थकों का प्रभाव चर्चा में रहा। उनकी पसंद के प्रत्याशियों के अध्यक्ष बनने की बातें राजनीतिक गलियारों में आम थीं।
वर्ष 1998 में दूसरे विधानसभा क्षेत्र से आए ताम्रध्वज साहू को चुनाव जिताने में भी अरुण अग्रवाल की भूमिका की चर्चा होती रही। हालांकि बाद के वर्षों में दोनों के राजनीतिक समीकरण पहले जैसे नहीं रहे।
उनके राजनीतिक प्रभाव का अंदाजा 1989 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी चर्चित घटना से भी लगाया जाता है। पुरुषोत्तम कौशिक के चुनाव जीतने के बाद अपनी राजनीतिक शर्तों को लेकर अरुण अग्रवाल के समर्थकों के साथ विवाद की स्थिति बनने की चर्चा उस दौर में रही थी।
2004 की चुनावी हार बनी बड़ा मोड़
अरुण अग्रवाल के राजनीतिक जीवन में वर्ष 2004 का नगर पंचायत चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। उन्होंने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन अपने ही राजनीतिक शिष्य रहे राजीव गुप्ता से लगभग सवा सौ मतों से हार गए।
यह हार उनके लिए बड़ा राजनीतिक झटका मानी गई। इसके बाद वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते गए और अधिकांश समय दुर्ग के पचरीपारा स्थित अपने निवास पर रहने लगे।
हालांकि राजनीतिक रूप से सक्रिय न रहने के बावजूद धमधा में उनका प्रभाव और उनके दौर की राजनीतिक स्मृतियां लंबे समय तक चर्चा में बनी रहीं।
समर्थकों की राजनीतिक यात्रा भी जारी रही
अरुण अग्रवाल के करीबी समर्थकों की राजनीतिक यात्रा भी आगे बढ़ती रही। अगले चुनाव में उनके खास समर्थक रमनलाल यादव ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत दर्ज की। वहीं वर्ष 2025 के चुनाव में उनकी भतीजा-बहू श्वेता प्रशांत अग्रवाल ने अध्यक्ष पद का चुनाव जीतकर परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।
बेबाक अंदाज और स्पष्ट बात के लिए थे चर्चित
अरुण अग्रवाल के व्यक्तित्व का एक पहलू उनका बेबाक स्वभाव भी था। उनसे जुड़े लोगों के अनुसार वे सामने की बात बिना लाग-लपेट के कहने के लिए जाने जाते थे। कई बार उनकी स्पष्टवादिता कठोर शब्दों में भी सामने आती थी।
उनके साथ व्यक्तिगत मुलाकातों और पुरानी राजनीतिक घटनाओं पर चर्चा करने वाले लोगों के लिए उनकी बातें और राजनीतिक अनुभव हमेशा अलग महत्व रखते थे।
पिछली दीवाली में हुई मुलाकात को भी अब एक अंतिम स्मृति के रूप में याद किया जा रहा है।
मालगुजार की विरासत और सामाजिक प्रभाव

मालगुजार के रूप में अरुण अग्रवाल को जमीन-जायदाद की विरासत मिली थी। इस विरासत के साथ क्षेत्र में उनकी सामाजिक पकड़ भी बनी रही। आज की पीढ़ी भले ही उन्हें सक्रिय राजनीति करते हुए न देख पाई हो, लेकिन धमधा की राजनीति से जुड़े पुराने लोगों के बीच ‘अरुण अग्रवाल’ और ‘लाल बंगला’ एक पूरे राजनीतिक दौर की पहचान रहे हैं।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण भी माना जा सकता है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति का प्रभाव केवल उसके निर्वाचित पद से तय नहीं होता। कई बार बिना किसी बड़े राजनीतिक पद के भी कोई व्यक्ति क्षेत्र के राजनीतिक निर्णयों, चुनावी समीकरणों और सामाजिक गतिविधियों पर गहरा प्रभाव छोड़ सकता है।
क्या लाल बंगला बनेगा राजनीतिक विरासत की धरोहर?
अरुण अग्रवाल के निधन के बाद अब उनके राजनीतिक दौर की स्मृतियों को संरक्षित करने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। धमधा का लाल बंगला केवल एक पुरानी हवेली नहीं, बल्कि क्षेत्र की राजनीतिक स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
यदि लाल बंगले को संरक्षित कर यहां अरुण अग्रवाल के राजनीतिक जीवन, उस दौर की चुनावी राजनीति, प्रमुख राजनीतिक घटनाओं और धमधा के बदलते राजनीतिक इतिहास से जुड़ी स्मृतियों को संजोया जाए, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण धरोहर बन सकती है।
एक छोटे राजनीतिक संग्रहालय या स्मृति केंद्र के रूप में इसे विकसित किया जाना धमधा के इतिहास को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सार्थक पहल हो सकती है।
अरुण अग्रवाल के निधन के साथ धमधा की राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसकी गूंज कई दशकों तक क्षेत्र की राजनीतिक गलियों में सुनाई देती रही।
स्व. अरुण अग्रवाल को विनम्र श्रद्धांजलि।
