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चुना फैक्ट्री के खिलाफ ग्रामीणों का दुर्ग में उग्र विरोध, कलेक्टर कार्यालय में जोरदार प्रदर्शन

दुर्ग जिले के धमधा ब्लॉक के ग्राम दानीकोकड़ी में प्रस्तावित चुना फैक्ट्री के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सड़कों पर दिखाई देने लगा है। सोमवार को गांव के सैकड़ों ग्रामीण महिला, बुजुर्ग और बच्चों सहित जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और प्रशासन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। कड़ी धूप के बावजूद ग्रामीण घंटों तक डटे रहे और अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी करते रहे। ग्रामीणों का कहना है कि यह फैक्ट्री उनके जीवन और आजीविका पर सीधा असर डालेगी। उनका आरोप है कि बिना उनकी सहमति के इस तरह का औद्योगिक प्रोजेक्ट थोपना अन्यायपूर्ण है। गांव के लोगों ने साफ तौर पर कहा कि वे किसी भी स्थिति में अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।

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विरोध की मुख्य वजह

दानीकोकड़ी गांव कृषि आधारित क्षेत्र है और यहां की अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित चुना फैक्ट्री से उनकी उपजाऊ जमीन बर्बाद हो जाएगी, साथ ही पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ेगा। धूल और प्रदूषण से फसल, पानी और हवा प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

कंपनी प्रतिनिधियों से विवाद

ग्रामीणों के अनुसार कुछ दिन पहले कंपनी की ओर से कुछ लोग गांव पहुंचे थे, जहां ग्रामीणों के साथ उनकी तीखी बहस हुई। इस दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया था। ग्रामीणों ने इस घटना की शिकायत एसडीएम को भी की, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से नाराजगी और बढ़ गई है।

कलेक्टर कार्यालय में प्रदर्शन

सोमवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से देखने को मिली। कई बुजुर्ग भी अपने परिवार के साथ इस आंदोलन में शामिल हुए। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि फैक्ट्री की स्वीकृति तत्काल रद्द की जाए और गांव के हितों को प्राथमिकता दी जाए।

युवाओं की चेतावनी

गांव के युवा किसान राजा स्वर्णकार ने कहा कि सरकार को गांव के विकास के नाम पर लोगों को उजाड़ना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में विकास चाहती है, तो गांव में सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए।
उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो ग्रामीण भूख हड़ताल और बड़े आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।

महिलाओं और बुजुर्गों की भावनाएं

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने कहा कि यह जमीन केवल खेती का साधन नहीं बल्कि उनके परिवार और पूर्वजों की पहचान है। गांव छोड़ना उनके लिए असंभव है। बुजुर्गों ने भी प्रशासन से अपील की कि उनकी पीढ़ियों की मेहनत को इस तरह खत्म न किया जाए।

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

ग्रामीणों ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। उनका कहना है कि बिना जनसुनवाई और सहमति के इस तरह के फैसले लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है।

आगे की रणनीति

ग्रामीणों ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। यदि उनकी मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो वे धरना, भूख हड़ताल और सड़क जाम जैसे कदम भी उठा सकते हैं।

दानीकोकड़ी का यह विरोध अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह मुद्दा पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। विकास और विस्थापन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यह अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

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